खेती बाड़ी
आप बृज किशोर जी जैसे किसानों से सीख सकते है
बिहार में सफलता से कर रहे हैं स्ट्राबेरी की खेती

बृजकिशोर प्रसाद मेहता, बिहार के औरंगाबाद जिले के चिल्हकी बिगहा गाॅव के सामान्य किसान हैं। श्री मेहता ने यह साबित कर दिया कि यदि बिहार के किसान नई सोच के साथ खेती करे तो उसे रोजगार ढ़ूढ़ने के लिए राज्य से बाहर पलायन नहीं करना पड़ेगा। इनकी पूरी कहानी में जो सबसे बड़ी बात निकल कर आयी कि यदि एक किसान किसी क्षेत्र में सफल होता है, तो उसको देख कर और उससे सीख कर उस क्षेत्र के दूसरे किसान भी सफल होते हैं।
प्रतिबद्ध के पत्रकार से बात करते हुए श्री मेहता बताते हैं कि पहले वो केवल मौसमी सब्जी की खेती करते थे, जिसमें उनकी आय बहुत कम होती थी। इसी आर्थिक कठिनाई के कारण उनका पुत्र काम के लिए हरियाणा के हिसार चला गया, जहाॅ वह एक प्रगतिशील किसान के स्ट्राबेरी के खेत में काम करना शुरू किया। पुत्र के कहने पर वो 2012 में स्ट्राबेरी की खेती देखने के लिए हिसार गए और करीब 1 माह तक रुक कर पूरी जानकारी इकट्ठा किया। उन्होंने स्ट्राबेरी के खेती करने के तरीके, खेती में लागत एवं आय की जानकारी ली। चूँकि हिसार की जलवायु उन्हें अपने क्षेत्र की जलवायु के लगभग समान लगी, तो उन्होंने स्ट्राबेरी की खेती के लिए अपने को मानसिक रूप से तैयार किया।
हिसार से लौटते समय वो स्ट्राबेरी के 07 पौधे अपने साथ ले आए। जिससे उन्होंने 420 पौधा तैयार किया। फिर इन पौधों से नए पौधें बनाने का सिलसिला शुरू हुआ। वो लगातार पौधों से पौधा बनाते गये। वर्ष 2014 में 1500 पौधा तैयार कर, उन्होंने लगभग 2 कट्ठे खेत में स्ट्राबेरी की खेती शुरू की। खेती की शुरूआत करने से पहले उद्यान विभाग की ओर से अनुदानित दर पर ड्रीप सिंचाई पद्धति एवं प्लास्टिक मल्च लिया, जो इस खेती की सफलता का अहम हिस्सा है। वर्ष 2015 में खेती को बढ़ाकर लगभग 1 एकड़ में किया, जिसमें लगभग 25000 पौधा लगाया गया। इसकी खेती सफल हुई तथा आय भी अच्छी रही। उनके खेत से उनका ज्यादातर स्ट्राबेरी बाहर से आए व्यापारी खरीद लेते हैं और इसको बाजार ढूढने बाहर नहीं जाना पड़ता है। अब वो परिवार के साथ सुखी-सम्पन्न जीवन यापन कर रहे हैं।
उनसे सीख कर अब चिल्हकी बिगहा और आस-पास के गाँवों के अन्य किसानों ने भी स्ट्राबेरी की खेती बड़े पैमाने पर शुरू कर दी है। कृषि विभाग ने इस गाॅव को उद्यानिक गाँव का नाम दिया गया। फिलहाल औरंगाबाद जिले में करीब 30 से 40 हेक्टेयर में स्ट्राबेरी की खेती हो रही है। केवल स्ट्राबेरी की खेती से साल में करीब 150 लोगों को 6 महीनों का काम यहाॅ मिल रहा हैै। इस गाॅव से मजदूरी के लिए पलायन काफी घटा है।
स्ट्राबेरी की खेती अपनाने के पूर्व 2.00 हे0 में भिण्डी एवं अन्य सब्जी की खेती से शुद्ध वार्षिक आय 78,500.00 रू॰ थी। स्ट्राबेरी की खेती अपनाने के बाद 2.00 हे॰ में समय पर स्ट्राबेरी की खेती के बाद उसी खेत में अन्य सब्जी की खेती से उन्हें शुद्ध वार्षिक आय 7,26,500.00 रू॰ हो रहा है। चूकि ड्रिप इरिगेशन के बिना स्ट्राबेरी की खेती सम्भव नहीं है और उनकी जमीन छोटे टुकड़ों में थी, इसलिए बृजकिशोर जी ने बदलेन के आधार पर अपनी छोटी-छोट जमीन को एक जगह करने को प्रयास शुरू किया। आज उनकी जमीन मात्र दो बड़े टुकड़ों में हो गयी है और उन्होंने अपने खेत में ड्रिप इरिगेशन की व्यवस्था कर ली है। स्ट्राबेरी के पौधे मेहता जी पुने, महाराश्ट्र से मंगाते हैं। जिसकी कीमत परिवहन के साथ 10 रूपये प्रति पौधा आता है। एक हेक्टेयर में कुल 60 हजार पौधें लगाए जाते हैं। स्ट्राबेरी कीमत बाजार में 350 से 400 रूपये प्रति किलो से ले कर 200 रूपये प्रति किलो तक मिलती है। कीमत में यह उतार-चढ़ाव सीजन पर निर्भर करता है। नवम्बर-दिसम्बर में जब इसका सीजन शुरू होता है, तब इसकी कीमत 350 से 400 रूपये प्रति किलो मिल जाता है, जो फरवरी-मार्च तक घट कर 200 रूपये प्रति किलो तक पहॅुच जाता है।
श्री मेहता ने बताया कि स्ट्राबेरी के उत्पाद की बिक्री की कोई समस्या नहीं है। कलकत्ता, बोकारो, राँची, पटना एवं छतीसगढ़ के रायपुर के व्यापारी अपने प्रतिनिधि को उत्पादन के समय चिल्हकी बिगहा भेज देते हंै। शहरों में जाने वाली बसों से स्ट्राबेरी प्रतिदिन भेज दिया जाता है। अब बिहार के अन्य जिलों में भी इसकी खेती की जा रही है।
पूरा पता- चिल्हकी बिगहा, पोस्टः अम्बा, थानाः अम्बा, प्रखण्डः कुटुम्बा, जिलाः औरंगाबाद (बिहार), मोबाइल- 9006946975,
करीब 150 लोगो को 6 महीने का रोजगार केवल इस स्ट्राबेरी के खेत से मिल रहा है

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