कहानी सफलता की

लालजी ने बकरी पालन कर निखारा जीवन

कोई काम छोटा नहीं होता, ये मानना है श्री लालजी वर्मा का। अपनी इसी सोंच और मेहनत के बदौलत वो आज उत्तराखंड के उद्धम सिंह नगर जिले के बकरी पालन बोर्ड के सचिव हैं। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कुशीनगर से आने वाले लालजी गांव उत्तराखंड के गौरीकला में अपने परिवार के साथ रहते हैं। 

1981 में ही लालजी ने दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश से बीकाम करने वाले लालजी को इसी साल गांव भी छोड़ना पड़ा। गांव छूटा तो नया बसेरा बसाने के लिए वो परिवार समेत उत्तराखंड के गांव गौरीकला आ गए और यहीं के केसर जूनियर हाई स्कूल में बतौर क्लर्क की नौकरी करने लगे। एक-दो नई नौकरी करने के बाद, उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला किया और सामाजिक कम से जुड़ गए। साल 1993 में वो अपने गांव के उप प्रधान के तौर पर चुने गए और 5 सालों तक गांव के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का पालन किया। 

इसी दौरान उन्होंने बकरी पालन करने का फैसला किया। काम छोटा था, लेकिन पूंजी अधिक न होने की वजह से लालजी कुछ और कर नहीं सकते थे। परिवार ने भी उनके इस फैसले में साथ दिया। पिछले कई सालों से बकरीपालन का काम कर रहे लालजी बताते हैं, कि उन्होंने बड़े स्तर पर इस काम की शुरुआत करीब 1-डेढ़ साल पहले की। आज उनके पास करीब 75 बकरियां हैं, जिनसे वो साल के करीब 1 लाख रुपए कमा लेते हैं। इसके अलावा उन्होंने 4 गाय भी रखीं हैं, जिनका दूध बेचकर अतिरिक्त आमदनी कमाते हैं। 
 

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उन्होंने बकरे की सिरोही प्रजाति और बकरी की ब्लैक बंगाल प्रति का मिक्स ब्रीड तैयार की। इस समय उनके पास इसी मिक्स ब्रीड के बकरियां और बकरे ज्यादा हैं। करीब 1 साल पहले की घटना का जिक्र करते हुए लालजी बताते हैं, कि गांव के लोगों को बकरी पालन संबंधी जानकारी देने और बकरे की एक नई प्रजाति पंतजा के बारे में बताने के लिए गोविंद बल्लभ पंत कृषि और प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय के कुछ वैज्ञानिकों का एक दल गांव आया। विश्वविद्यायल ने ही इस प्रजाती को विकसित किया था। लालजी को जब इस बात की जानकारी मिली तो वो भी उस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पहुंचे। वैज्ञानिक उस समय बकरी पालन करने के इच्छुक लोगों को पंजता प्रति का एक बकरा और बकरी मुफ्त में दे रहे थे। उन्हेंने वैज्ञानिकों को बताया कि पिछले कई सालों से वे गांव में बकरी पालन करते हैं। और उनके पास सिरोही और ब्लैक बंगाल का मिक्स ब्रीड जिसे उन्होंने ही तैयार किया है। अपने काम से उत्साहित लालजी को वैज्ञानिकों की बातों से निराशा हाथ लगी। उन्हें लग रहा था कि वैज्ञानिक उनके इस प्रयास को सराहेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बल्कि वैज्ञानिकों ने उनसे कहा कि उनके द्वारा विकसित की गई प्रजाति को पालना उत्तराखंड के वातावरण और जलवायु में अच्छा नहीं है। वो बीमार रहेंगे, कमजोर हो जाएंगे और उनके बच्चे भी जल्द ही मर जाएंगे। वैज्ञानिकों ने उन्हें पंतजा प्रजाति को पालने की सलाह दी, लेकिन लालजी नहीं माने। उन्हें अपने काम पर पूरा भरोसा था जो कि आगे चल कर सच साबित हुआ। 

लालजी के मुताबिक वो बकरी पालन से होने वाली सारी कमाई वो उनकी पत्नि श्रीमति संवरी देवी को दे देते हैं, जो कि आंचल संघ जो कि एक दूध उत्पादक समिति है, की उद्धमसिंह नगर से जिला प्रतिनिधि हैं। ये पैसे जरूरत के वक्त काम आते हैं और घर खर्च गाय पालन से चलता है।
 

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