खेती बाड़ी
मंगरैल की खेती पर सरकार का जोर

2022 तक किसानों की आमदनी बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार राज्य में मंगरैल जिसे हम कलौंजी के नाम से भी जानते हैं, कि खेती को बढ़ावा दे रही है। किसान कम मेहनत और कम खर्च में मंगरैल की खेती कर ज्यादा फायदा कमा सकते हैं। जानकारों के मुताबिक गेहूं की 4 एकड़ खेती से जितनी आमदनी हासिल होती है, उतनी आमदनी मंगरैल की 1 एकड़ खेती से अर्जित की जा सकती है।
मिट्टी
मंगरैल की खेती के लिए कंकरीली और पथरीली मिट्टी को छोड़ कर सभी प्रकार की मिट्टी अच्छी मानी जाती है। यहां किसानों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस भी प्रकार मिट्टी में वो मंगरैल की खेती कर रहे हैं, वहां पानी के निकलने कि अच्छी व्यवस्था हो।
तैयारी
मंगरैल की खेती के लिए सबसे पहले खेत की 1 से 2 बार उथली जुताई करे लें। उसके बाद खेत में पाटा चलाकर उसे समतल कर लें। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए खेत में नमी का होना जरूरी है। इस लिए खेत को पलेवा देकर ही बुआई करना अच्छा रहता है।
बीज
मंगरैल की खेती के लिए बीजों की बुआई दो तरह से की जाती है। पहला तरीका है कतारों में बुआई करना और दूसरा है छिड़काव विधि से बुआई करना। दोनों ही विधियों से बुआई करने में बीजों की अलग-अलग मात्रा की जरूरत पड़ती है। कतारों में बुआई के लिए 8 से 10 किलो प्रति हेक्टेअर और छिड़काव विधि से बुआई में 16-17 किलो बीज प्रति हेक्टेअर की दर से जरूरत पड़ती है। इसके बीज बाजार में 200-300 रुपए प्रति किलो की दर से आसानी से मिल जाते हैं। बीजों को बुआई से पहले उपचारित करना अच्छा माना जाता है। बुआई के लिए उन्नत किस्म जैसे एन.एस. 44 का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। यह किस्म 150-160 दिन में तैयार हो जाती है और 4.5-5.5 क्विंटल प्रति हेक्टेअर का उत्पादन देती है।
खाद
मंगरैल की खेती में बहुत खाद की जरूरत नहीं पड़ती है। फिर भी अधिक पैदावार के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए बुआई के समय ही सड़े हुए गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सिंचाई
मंगरैल की फसल सिंचित और असिंचित दोनों तरह से उगाई जाती है। जिस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है, उसे असिंचित फसल के रुप में उगाया जा सकता है। इसमें सिंचाई बुआई के बाद क्रमशः 30, 60 और 90 दिनों के बाद करनी चाहिए।
निराई-गुड़ाई
बीज के अंकुरण के 20-25 दिनों के बाद पहली निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। उसके बाद जरूरत के मुताबिक निराई-गुड़ाई की जा सकती है।
रोग
मंगरैल के पौधे में उक्टा रोग लगने की संभावना रहती है। इससे बचने के लिए बीजों को 2 ग्राम थायरम और 2 ग्राम बेबस्टिन प्रति किलो की दर से उपचारित करना चाहिए।
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